Malik Aur Naukrani Ki Chudai
मुझे इस घर में काम करते हुए क़रीब 2 महीने हो गए हैं। विवेक साहब की पत्नी नहीं थी। उनकी डेथ को काफ़ी साल हो चुके थे और वे राजपूत थे। और सभी उनको विवेक साहब कहकर बुलाते थे। उनकी दो लड़कियाँ थीं, जो अजमेर में कॉलेज में पढ़ती थीं। घर में वे अकेले ही रहते थे। विवेक की उम्र 50 साल थी। वे अक्सर मुझे घूरते रहते थे। मैंने उस तरफ़ ज़्यादा ध्यान कभी नहीं दिया था। मेरे पति मज़दूरी के काम से आस-पास के शहर में चला करते थे।
उस टाइम मैं घर पर अकेली ही रहती थी। इससे मेरी चुदाने की आस और प्यास दोनों ज़्यादा हो जाती थी। जवानी का आलम मुझ पर भी चढ़ा हुआ था। जब डाली फलों से लद जाती है तो वह अपने आप झुक जाती है। मेरे भी अंग-अंग में से जवानी झलकती थी। मेरे फल भी लदकर झूल रहे थे।
मन तो करता था कि इन फलों का रस कोई चूस ले, कोई मेरे फलों को खींचे और मसले और इन्हें बस मरोड़ डाले। मेरे चूतड़ों की गोलाई मस्त लचकदार थी। मेरे दोनों चूतड़ चिकने और अलग-अलग खिले हुए थे। दरार तो मानो दूसरों के लंड को अंदर समाने के लिए उन्हें इनवाइट करती थी। मेरे मन की बेचैनी भला क्यों न जगे?
इसी प्यास के चक्कर में मेरी नज़र कभी-कभी उनके पजामे पर चली जाती थी। उनके झूलते हुए लंड को मैं उनके पजामे के ऊपर से ही महसूस कर लेती थी। जब विवेक मूड में होते थे तो वे सोफ़े पर बैठकर न्यूज़पेपर पढ़ने का बहाना करते थे। और पजामे में से अपने खड़े लंड को मुझे दिखाने की कोशिश करते थे।
उनके अंडरवियर में उनके लंड का पानी भरा होता था। वे उसे मुझे ही धोने को देते थे। उसकी इस हरकत पर मुझे हँसी आती थी, क्योंकि मैं उनके डोरे डालने के सारे तरीक़े पहले से जानती थी। मेरे मन में भी कसक उठती थी कि इस 50 साल के जवान को पकड़ लूँ और इसकी ढलती जवानी को अपना रस पिला दूँ।
मुझे भी जब वे अपनी हरकतों से मुस्कुराते हुए देखते थे तो उनकी हिम्मत बढ़ जाती थी। पर एक दिन ऐसा टाइम आ गया जिस दिन वे चक्कर में आ गए। आख़िर आता भी क्यों न, आग दोनों तरफ़ बराबर जो लगी हुई थी। उनका लंड मुझे चोदने के लिए बेताब हो रहा था और मेरी चूत उसे देखकर पानी छोड़ रही थी।
उस दिन मुझे यह भी पता चला कि काम करते टाइम वे मेरे बूब्स को मेरे ब्लाउज़ में से देख रहे हैं। मेरा ध्यान जैसे अपने ब्लाउज़ की तरफ़ गया तो मैं शर्मा गई। मेरे बैठकर काम करने की वजह से मेरे चूतड़ों की गोलाई एकदम साफ़ दिखाई देती थी। जिसे वे बहुत शौक़ से देखते थे।
मैं अब उनकी बेचैनी को समझने लग गई थी कि बिना औरत के आदमी की इच्छा कितनी बढ़ जाती है। मुझे उन पर अब दया आने लग गई थी। कभी-कभी उनकी यह हालत देखकर मेरी चूत भी गरम हो जाती थी और वह मेरी पैंटी को गीला कर देती थी।
मैं उन पर दया करते हुए उन्हें रोज़ अपने बूब्स दिखाया करती थी। और मेरी इसी दया ने मुझे उनसे चुदवा दिया था। एक दिन उनका खड़ा लंड उनके हाथ में था। यह देखते ही मेरी चूत एकदम फड़क उठी। मेरी वासना भी अब जाग उठी। मेरी इच्छा हुई कि मैं उनका लंड पकड़कर मसल दूँ। ये कहानी आप फ्री XXX स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
मैं – अरे बाबू जी ज़रा नीचे भी देखो।
विवेक कुछ और समझे और उन्होंने झट से अपने लंड से हाथ हटाकर बोले – क्या हुआ?
मैं उनकी भौंचक्की हालत पर हँसते हुए बोली – वो सोफ़े के नीचे सफ़ाई करनी है।
विवेक – ओह मैं कुछ और समझा।
मैं – मैं बताऊँ आप समझे कि नीचे।
यह कहकर मैं मुँह बंद करके हँसने लग गई।
तो वे बोले – चल हट मैं अकेला हूँ तो तुम मज़ाक करती हो।
मैं उनके लंड को देखते हुए बोली – अरे आप अपने आपको अकेला मत समझिए। मैं हूँ ना।
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले – सच लाची?
मेरे जिस्म में एक करंट-सा दौड़ गया। उनका उतावलापन अब भड़क उठा था। और मैं बोली – अरे साहब मेरा हाथ छोड़िए। पर मैंने अपना हाथ नहीं छुड़वाया और वे अब आगे बढ़ गए। उन्होंने मुझे अपनी तरफ़ खींचा। उनके जिस्म में बहुत ताक़त थी। फिर मैंने उनकी आँखों में देखा तो मुझे उनकी आँखों में वासना, प्यार, दया की भावना साफ़ दिख रही थी।
विवेक – देख लाची तू भी जवान है और मैं भी। देख तू मुझे ख़ुश कर दे मैं तुझे पैसे दे दूँगा।
मुझे अब पैसों का लालच आ गया था, इसलिए मेरे अंदर उनसे चुदने की इच्छा जाग उठी।
मैं अब दबी हुई आवाज़ में बोली – साहब मैं पूरे 1000 रुपये लूँगी। उसके बाद फिर आप जो मर्ज़ी कर लेना।
यह सुनते ही उन्होंने मुझे अपने सीने से लगा लिया और उनका लंड मेरी चूत में दबाने लग गया।
मैं – साहब अभी नहीं। मेरी मानो मैं रात को आ जाऊँगी। दिन में मुझे शर्म आती है।
विवेक – दिन में यहाँ कौन है?
मैंने उनके जिस्म को सहलाया और विवेक ने मेरे बूब्स पर हाथ रखकर उन्हें सहलाना शुरू कर दिया। इससे मेरे जिस्म में बिजलियाँ दौड़ने लग गईं। मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि बात सीधी चुदाई तक आ जाएगी। पर उनका काफ़ी दिनों से प्यासा लंड अब उछल मार रहा था।
उनकी ऐसी हालत देखकर मुझे दया आ गई। मैंने धीरे से उनका लंड थाम लिया। अब उनका लंड फड़क उठा और ज़ोर मारने लग गया। मेरी चूत भी चुदने के लिए अब पागल हो रही थी और मैं बोली – बाबू जी ये तो बहुत मोटा है। मुझे डर लग रहा है। ये कहानी आप फ्री XXX स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
उनका लंड सच में काफ़ी मोटा था। फिर उन्होंने मुझे गले से लगाया और वे बोले – लाची।
विवेक ने मुझे कसकर गले लगा लिया था। मेरी कमर पर उनके हाथ चल रहे थे। अब मेरे जिस्म में भी वासना जल उठी थी। मैं धीरे-धीरे रंग में आने लग गई और अब मैं अपनी औक़ात पर आ गई और मैं बोली।
मैं – बाबू जी आपका लंड तो बहुत मस्त है। अब तो आप मुझे चोद ही दो।
मेरी यह बात सुनकर विवेक के जिस्म में करंट चलने लग गया और वे जोश से भर उठे। फिर उन्होंने मेरे ब्लाउज़ के बटन खोल दिए और मेरी ब्रा के हुक्स भी खोल दिए। कुछ ही देर में मेरा जिस्म ऊपर से पूरा नंगा हो गया। मेरे तने हुए सुंदर गोरे बूब्स उनके सामने आ गए थे। अब मुझे उनके कपड़े अच्छे नहीं लग रहे थे, इसलिए मैं बोली।
मैं – अपने कपड़े भी उतारो ना। या आपको शर्म आ रही है?
विवेक – ले मैंने अपना अंडरवियर और बनियान उतार दिया। पर तेरा ये पेटीकोट?
उन्होंने मुझे नंगी होने के लिए कह दिया था तो मैं बोली – नहीं बाबू जी ऐसे तो मेरी चूत आपको दिख जाएगी।
वैसे अंदर से मैं भी नंगी होने को उतावली हो रही थी और वे बोले – साली क्या चूत तू तो बहुत बेशरम है।
फिर मैंने अपना पेटीकोट उतार दिया और मैंने अपनी चूत विवेक के सामने नंगी कर दी। वे मेरी चूत को देखते ही रह गए और मैं बोली।
मैं – लो कर लो मेरी चूत के दर्शन। और आपके मोटे लंबे लंड को मेरी चूत पसंद आई? अब मुझे और मेरी चूत को भी अपने लंड के दर्शन करवा दो।
मेरी यह बात सुनकर विवेक को हँसी आ गई। उसने अपनी पैंट और अंडरवियर उतार दिए। सच में उनका लंड बहुत ही मोटा और लंबा था। हम दोनों अब पूरे नंगे ही थे और आपस में लिपटने की कोशिश कर रहे थे। उनका लंड मेरी चूत के आस-पास लग रहा था और मेरी चूत के मुँह पर से फिसल रहा था। मैं भी अपनी चूत को लंड के निशाने पर ले रही थी कि छेद पर आते ही मैं इसे अंदर ले लूँ।
विवेक मेरी कमर पर हाथ डालकर मुझे किस करने लग गए। तभी उनका लंड मेरे छेद से टकरा गया और मेरी चूत अपने आप खुल गई। दोनों ही अपने-अपने निशाने पर थे। मैंने चूत पर थोड़ा-सा ज़ोर लगाया और लंड मेरी चूत को चीरता हुआ अंदर चला गया।
मैं – आहा आह्ह बाबू जी आपने अंदर डाल दिया। मैं तो मर गई आह्ह।
बाबू – चल आजा बेड पर चुदाई करते हैं।
मैं अपनी चूत हिलाते हुए लंड को अंदर-बाहर करने लग गई और मैं बोली – बाबू जी और अंदर डालो ना। मेरी चूत का भोसड़ा बना दो।
विवेक ने तभी पास के बेड पर मुझे लिटा दिया और मुझे अपने नीचे दबा लिया और वे बोले।
विवेक – तू तो एकदम नई लगती है। तेरी चूत एकदम टाइट है।
मैं – फिर चोदो ना मेरी चूत को। ये तो आपके लंड की भूखी है। आह्ह और ज़ोर से चोदो बाबू जी।
मैं उनके मोटे लंड को पाकर निहाल हो चुकी थी। मेरी चूत की दीवारों से लगता हुआ लंड अंदर तक जा रहा था। मेरी चूत से उनके लंड की मोटाई सहन नहीं हो रही थी। विवेक मस्ती में अपना लंड अंदर-बाहर कर रहा था और मैं बोली – आपका लंड एक मोटी लकड़ी जैसा है। प्लीज़ अंदर आराम से करो। ये कहानी आप फ्री XXX स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
मेरी यह बात सुनकर वे जोश में आ गए और मुझे दबाकर उन्होंने अपना लंड पूरे ज़ोर से अंदर डाल दिया। मैं दर्द से चिल्ला उठी तो उन्होंने एक और धक्का मार दिया। फिर उन्होंने पूरा लंड बाहर निकालकर फिर से अंदर डाल दिया। मैं फिर से चिल्ला उठी।
मेरे चिल्लाने से वे शायद और जोश में आ गए थे। उन्होंने ज़ोर-ज़ोर से मेरी चूत में अपना लंड मारना शुरू कर दिया। मैं पहले चिल्लाती रही, पर अब मुझे धीरे-धीरे मज़ा आ रहा था। फिर मैं सीधी लेट गई और अपनी साँसें ठीक करने लग गई। अब मैंने नीचे से धीरे-धीरे अपनी कमर हिलाकर उसका साथ देना शुरू कर दिया।
अब मुझे भी मज़ा आने लग गया था। उनके मोटे लंड ने मेरी टाइट चूत को खोल दिया था। अब मैं भी उनसे चिपकने लग गई थी। मुझे अब बहुत मज़ा आने लग गया था। मेरी चूत के अंदर खून और मेरी चूत का पानी मिलकर लंड के लिए एक मस्त चिकना रास्ता बना रहे थे।
मैं – मारो मेरी चूत और फाड़ दो आज इसे पूरी।
मैं यह कहते हुए सिसकियाँ ले रही थी। विवेक के चेहरे पर अब पसीने की बूंदें झलक आई थीं। जो मेरे चेहरे पर टपककर नीचे गिर रही थीं। मैं चुदाई में मदहोश होती जा रही थी। ऐसे मस्त और जानदार लंड जब जमकर चूत चोदते हैं तो समझ जाओ ये लंड आपको जन्नत की सैर ज़रूर करवा देते हैं।
मुझे भरपूर मज़ा आ रहा था। विवेक की कमर मस्त चल रही थी। मुझे उनका लंड पूरा मज़ा दे रहा था, पर हाय राम मेरी चूत भी आख़िर कब तक इस मोटे लंड को सहन कर पाती। मेरी तो जान ही निकाली जा रही थी, इसलिए मैं बोली।
मैं – आह आँह माँ मैं तो मर गई। मेरा रस निकलने वाला है। बस करो बाबू जी मेरी चूत का पानी निकल गया है। अब आप भी अपना निकालो ना।
विवेक – ये ले मैं भी अब और कितनी देर टिकता। ये ले मेरी लाची रानी अपना मुँह खोल और मेरे लंड का सारा पानी चूस ले।
विवेक ने अपना लंड एकदम से मेरी चूत से निकाला और अपने हाथ में पकड़कर वह हिलाने लग गए। अब उनके लंड का सारा पानी मेरे पूरे फेस पर फैल गया। उनका पानी काफ़ी देर तक निकला। और उनके लंड का पानी काफ़ी सारा था।
मैंने उनके लंड के पानी को अपने हाथों से अपने पूरे फेस पर मल लिया। पहले तो वह मुझे बहुत ही गंदा लग रहा था, पर जब मैंने थोड़ा-सा उसे अपनी जीभ से चाटा। तो मुझे वह बहुत प्यारा लगा और मैं उसे सारा चाट गई। फिर हम दोनों एक-दूसरे के साथ नंगे ही लेट गए।
विवेक – मेरी लाची मैंने बहुत सालों से चूत नहीं मारी थी। आज तूने मुझे स्वर्ग का मज़ा दे दिया है।
मैं – हाँ बाबू जी, एक औरत की कमी तो एक औरत ही पूरी कर सकती है ना। और आपका लंड भी बहुत मस्त है।
विवेक – अब ये ले लाची पूरे 2000 रुपये। 1000 रुपये तेरी चूत चुदाई के और 1000 रुपये जो मैंने तुझे दर्द दिया उसके।
मैं तो उनकी तरफ़ देखती ही रह गई, क्योंकि मुझे 1000 की जगह 2000 रुपये मिल रहे थे। फिर विवेक ने मुझे किस किया और मैं शर्माकर मुड़ गई।
मैं – बाबू जी शाम को फिर से आपको ख़ुश करने आऊँगी और इस बार कोई पैसा भी नहीं लूँगी।
यह कहते हुए मैं पीछे मुड़कर मुस्कुराते हुए वहाँ से भाग उठी। मेरी चूत उस भारी लंड से चुदने के कारण दर्द कर रही थी और शायद वह थोड़ी सूज भी गई थी। जब मैंने अपनी चूत को देखा तो वह लाल हो चुकी थी। मैंने अपनी चूत पर दवाई लगाई। फिर मैंने 2000 रुपये को प्यार से देखा और उन्हें सँभालकर रख दिए। फिर शाम को जब मैं फिर से विवेक के घर गई तो उन्होंने मुझे मुस्कुराते हुए देखा और मुझे बेड पर धक्का दे दिया।
विवेक – ये काम छोड़ो और आज तुम मेरी सेवा करो। मैं तुम्हें इसके ख़ूब पैसे दूँगा।
मैं – ना बाबू जी अब नहीं। मेरी चूत का कचूमर बन गया है। अब ज़बरदस्ती मत करो। अब मुझे न चोदो। मुझे दर्द हो रहा है और मुझे अब पैसे नहीं चाहिए हैं।
विवेक – लाची रानी अगर चूत में दर्द है तो अपनी गाँड़ मरवा ले। पर देख मना मत करियो।
मैं – बाबू जी मैंने अपनी गाँड़ ज़्यादा नहीं मरवाई है, पर आप आज मेरी गाँड़ भी मार लो।
विवेक – चल फिर घोड़ी बन जा।
मैंने उन्हें पैसे के लिए मना किया था, पर मुझे पता था कि वे मुझे ज़रूर पैसे देंगे। इसलिए मैंने अपना घाघरा ऊपर करके जल्दी से घोड़ी बन गई। मेरी चिकनी गाँड़ देखकर उनका लंड झट से खड़ा हो गया।
मैं – बाबू जी ज़रा नीचे भी देखो। आपने मेरी चूत का क्या पकौड़ा बना दिया है।
पर मेरी गाँड़ को देखकर वे कुछ नहीं बोले और तेल में अपनी एक उँगली डुबोकर उन्होंने वो उँगली मेरी गाँड़ में डाल दी। ऐसे वे मेरी गाँड़ को अंदर से चिकना करने लग गए। फिर उन्होंने अपने लंड पर ऑयल लगाया और अब लंड और गाँड़ दोनों चुदने के लिए तैयार थी। ये कहानी आप फ्री XXX स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
विवेक – लाची तैयार हो जा। ये लंड अब तेरी गाँड़ में जाएगा।
मैं – हाय बाबू जी ज़रा धीरे से डालना।
पर मेरी सुनता कौन। जैसे लंड का टोपा गाँड़ में गया उन्होंने झट से धक्का मारकर लंड अंदर डाल दिया। मेरे मुँह से चीख निकल पड़ी और मैं बोली – हाय राम आप तो मेरी गाँड़ को फाड़ दोगे आह्ह।
विवेक – चुप कर साली। मुझे तो मज़ा आ रहा है। बहुत सालों बाद कोई मिली है। मज़ा लेने दे मुझे।
उनका दूसरा बेदर्द धक्का मुझे अंदर तक हिला गया। उनका लंड मेरी गाँड़ के हिसाब से बहुत बड़ा और मोटा था और अब उनके दिल में मेरे लिए ज़रा-सा भी रहम नहीं था। ऑयल भी अब ज़्यादा काम नहीं कर रहा था। मेरी गाँड़ की अंदर की दीवार शायद अब छिल गई थी।
अब उनकी स्पीड तेज़ हो गई। अब उनका लंड अब मुझे अंदर चोट मारने लग गया। दर्द के मारे मेरी आँखों में आँसू आ गए और मेरे होंठ सीले हुए थे। मैं दर्द को बरदाश्त कर रही थी। लंड को अंदर डालते हुए उन्हें एहसास हुआ कि शायद वे बहुत ज़्यादा बेरहम हो गए हैं।
इसलिए उन्होंने लंड बाहर निकाल लिया और मैं एकदम से तरफ़ निढाल होकर लेट गई। पर अभी तक विवेक के लंड का पानी नहीं निकला था, पर उनका लंड बहुत ज़ोर मार रहा था। मैंने अपनी आँखों के आँसू साफ़ किए और मैंने अपने मुँह की तरफ़ इशारा किया। फिर उन्होंने अपना लंड मेरे मुँह में डाल दिया।
वे धीरे-धीरे अब वो मेरा मुँह चोदने लग गए। मैंने भी उनका लंड पकड़कर मुठ मारना शुरू कर दिया। उनका लंड मस्ती में आ गया था और एकदम फूल उठा। मौक़ा देखते हुए मैंने उनके लंड को मुट्ठी में कस लिया और ज़ोर-ज़ोर से घुमाकर मैं उसे मोड़ने लग गई।
मेरे मुँह में धक्के की स्पीड अब तेज़ हो गई थी। मेरे मुँह में भी चोट लग रही थी। उनका लंड कभी-कभी मेरे गले में उतर रहा था। मैं उसका लंड दबा-दबाकर उसका पानी निकालने की कोशिश कर रही थी। आख़िर में लंड एकदम से टाइट हो गया और लंड ने मेरे गले में अपना सारा पानी निकाल दिया।
मैं कुछ नहीं कर पाई और उनका पानी मेरे गले में निकलता ही चला गया। उनका लंड मेरे गले में फुहारे छोड़ रहा था। मैं सारा पानी सीधे ही पी गई। विवेक ने लंड को मेरे मुँह से बाहर निकाला और लंड को झटका। फिर लंड पर लगे थोड़े से पानी को मेरे होंठों पर रगड़कर साफ़ कर दिया।
मैंने उसे भी अपनी जीभ निकालकर चाट लिया। अब विवेक धीरे से मुझ पर लेट गए और मुझे प्यार से किस करने लग गए। मुझे अंदर तक उनका प्यार महसूस हुआ और फिर मैंने मज़े में अपनी आँखें बंद कर लीं। मुझे बहुत ही मज़ा आ रहा था।
उनके जिस्म का भार जैसे ही मेरे जिस्म से कम हुआ तभी मैं होश में आ गई। मेरी गाँड़ और चूत आज बहुत दर्द कर रही थी, पर मुझे एक अलग ही मज़ा भी आ रहा था। विवेक ने मुझे फिर 5000 रुपये दिए, जिसे लेने से मैंने मना कर दिया। मेरे दिल में पैसे लेने की इच्छा थी, पर जो मुझे मज़ा मिला था उसका कोई मोल नहीं था। मैंने चुप करके उनसे पैसे ले लिए।
मैं – बाबू जी आज आपने मुझे आसमान पर बिठा दिया, पर देखो आपने मेरी चूत और गाँड़ का क्या हाल कर दिया है।
विवेक – लाची अब तुम कहाँ जाओगी। अब तुम मेरी लाड़ली बन चुकी हो। अब तुम कुछ दिन आराम करो और फिर से हम मस्ती करेंगे। फिर से हम तन और मन से स्वर्ग की सैर करोगी।
मैं विवेक से लिपट गई और उन्हें किस करते हुए बोली – आप कितने भोले हो साहब। मैं आपकी आज से दासी बन चुकी हूँ। अपनी लाड़ली को अपने सीने में छुपा लो। मुझे कभी तुम छोड़ना मत। विवेक ने मुझे अपने से चिपका लिया और मुझे बेड पर लिटाकर वे फिर से मुझे प्यार करने लग गए। मैं उनके प्यार में खो गई और आने वाले दिनों के सपने देखने लग गई।
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